Tuesday, 11 October 2011

कितना प्यारा होता है “बचपन”

                                         कितना प्यारा होता है “बचपन”
जाने कहां गये वो दिन...............................................................................
बचपन एक ऐसा अद्भुत मनोरंजन का नाम है जिसका चर्चा होने पर हर किसी के मन में उसके बचपन की शरारतें याद आने लगती हैं मानों एक लहर सी दौड़ उठती है जैसे वह लहर याद दिलाता है कि “ मंरा भी एक बचपन था” मैं भी एक छोटा बच्चा था लेकिन एक थोड़े ही समय बाद यह मन आचानक दुनिया की बातों में खो जाता है और बचपन शब्द का एहसास उसके मन से तब तक गायब हो जाता है जबतक कि उसे याद न दिलाया जाय या फिर कहीं बचपन शब्द की चर्चा किसी दूसरे के द्वारा न कि जाय। एक बार एक बुजूर्ग व्यक्ति से हमारी मुलाकात हो गयी और हमने यूं ही पूछ डाला कि दादाजी आपका बचपन कैसा था

मानो उनके चेहरे पर खुषी की एक लहर दौड़ गयी वह अपनी अस्सी वर्ष की अवस्था को छोड़कर अपने आठ साल की अवस्था में पहुच गयें और अपने बचपन की बातों को ऐसे बताने लगे मानों की वह बूजूर्ग नहीं आज भी बच्चे ही हैं। जब कभी मैं उनसे कहता कि मेरा बचपन आपके बचपन से बेहतर  रहा तो वह अपने बजपन के बारे में इस प्रकार से बताने लगते जैसे किसी जंग में शत्रु को परास्त करना है और अपने बचपन को मेरे बचपन से कई गुना बेहतर बता देते। आप इस बात का अन्दाजा तभी लगा सकते हैं जब आप भी पहुच जायेंगे अपने बचपन में और उन सभी गुजरे दिनों को याद करेंगे कि आप ने क्या-क्या शरारतें किया था बचपने में।
बात कुछ भी हो लेकिन मै आपको केवल यह बताना चाहता हू कि कितना प्यारा होता है बचपन
“जिस प्रकार दिन का गहना सवेरा व रात का गहना अंधेरा होता है” मेरे ख्याल से ठीक उसी प्रकार मानव जीवन का गहना बचपन होता है वह गहना जो सभी को मिलता है और सभी लोग अपनी अनुभवों के अनुसार उसका खुब लाभ उठातें हैं । वह दिन तो हकिकत में चला गया लेकिन भुलने से तो वह भुलाया भी नहीं जाता। बचपन का अर्थ अभी तक मै नहीं जानता था लेकिन अब समझ में आया कि बच अर्थात बचना और पन अर्था प्रारम्भ या अंकुरण। इस प्रकार यदि देखा जाय तो बचपन वाले प्राणी से बड़े से बड़ा प्राणी भी बचने का प्रयास करता हैं। आप देखे होंगे कि कभी-कभी बूजूर्ग लोग भी छोटे बच्चों से परेसान हो जाते हैं क्योंकि वह तो कुछ भी कर सकता उसे किसी प्रकार की बड़ी या छोटी घटना का आभाष नहीं होता है लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है उसके अन्दर एक समझदारी नाम की चीज भी पनपने लगती है इसी कारण एक विद्वान ने कहा था कि‘ समझदारी इन्सान को कायर बना देती है।’
 

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