Sunday, 25 March 2012

पेट की खातिर


पापी पेट की खातिर सब करना होता है


लगन आने से डलिया दौरी बनाने में मशगूल धरकार परिवार

ग्रामीण अंचलों में बास के द्वारा डलिया दौरी बनाकर परिवार का पालन पोषण करने वाले मजदूरी को अब पेट पालना भी मुश्किल हो गया है। डलिया दौरी के धंधे पर भी महंगाई का बहुत ज्यादा असर पड. रहा है। कोईराजपुर, दासेपुर सहित अन्य गांवों में रोड के किनारे टूटे-फूटे मकान में रह रहे धरकार जाति के लोगों को देखकर ही उनकी गरीबी साफ झलकती नजर आती है। आजमगढ.  से आकर कोईराजपुर गाॅव में काशी कृषक इण्टर कालेज के बगल में निवास कर रहे धरकार रामदुलार, गुलाब, सुरेन्द्र, पवन आदि का कहना है कि महॅगाई इतना ज्यादा हो गया है कि एक बास सौ रूपये से लेकर एक सौ पचास रूपये तक मिलता है जिसमें एक बडी और एक छोटी दौरी ही बन पाती है। उसने बताया कि हरे बास को खरीद कर लाने के बाद उसे तुरन्त फाड. दिया जाता है व एक दिन सुखने के बाद उससे दौरी बनाया जाता है। लोगों ने बताया कि रात दिन कडी मेहनत करने के बाद एक आदमी केवल एक ही दौरी बना पाता है जिसकी किमत दो सौ दस रूपये से लेकर दो सौ पचास रूपये तक होता है। इनके बीबी बच्चे भी इनके ही काम में हाथ बटाते हैं। इन लोगों ने बताया कि बरसात के समय में डलिया दौरी की बिक्री कम हो जाती है जिसके कारण सूद का पैसा लेकर परिवार का पालन पोषण कर पाते हैं पैसा न रह पाने से कभीकभी फांका भी चल जाता है। लकिन गर्मी में लगन का समय आ जाता है जिसके कारण इसकि खींच बाजार में अधिक हो जाती है। जिस कारण धूपछाॅव को देखे बिना रातो दिन मेहनत करके ये अपने व्यवसाय में लगे हुए हैं कयोकि पापी पेट का आग बूझाने के लिये कुछ न कुछ करना तो जरूरी है।

Post a Comment