Tuesday, 21 April 2015

ट्वीटर से किसानों को दिया जा रहा है आश्वासन, लेकिन रोज मर रहे हैं किसान।

ट्वीटर से किसानों को दिया जा रहा है आश्वासन, लेकिन रोज मर रहे हैं किसान।
वाराणसी। एक तरफ बारिस में किसानों की पूरी फसल चौपट हो गयी है फसलों की हालत देखकर किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जा रहे हैं अखबारों व टीवी चैनलों के माध्यम से प्रतिदिन यह देखने और पढ़ने को मिलता है कि देश में रोज एक किसान मर रहा है यह आंकड़े हवा हवाई हैं कुछ किसानों के मरने के बाद तो सरकारी अधिकारी उसे पुरानी बीमारी का शिकार बता देते हैं और कहते हैं कि तबीयत वर्षों से खराब चल रही थी जिसके कारण मौत हो गयी लेकिन क्या सरकार यह आंकड़ा या यह मशीन भी रखी है जिससे यह साबित हो सके कि किसान की मौत उसके खेती में हुई क्षति के कारण हुआ है। एक तरफ तमाम प्रकार के दावे प्रदेश व केन्द्र सरकार द्वारा सोशल मिडिया के माध्यम से किया जा रहा है कि किसाना आत्म हत्या न करें लेकिन इन दावे और वादे के बावजूद भी किसान आयेदिन आत्महत्या कर रहे हैं या फिर किसी न किसी कारण से उनकी मौत होते जा रही है। फिलहाल सरकार द्वारा किये गये सभी दावे मौके पर हवा—हवाई साबित हो रहे हैं क्योंकि जमीनी स्तर पर इसकी सच्चाई कुछ और ही बया करती है कोई क्षेत्रीय अधिकारी इसकी जांच  गॉव में पहुचकर नहीं कर रहा है। 

तो कैसे तैयार होगा आंकड़ा व किसानों का नुकसान?
यदि लेखपाल मौके पर गॉवों में पहुचकर आंकड़े तैयार नहीं कर रहे हैं और लापरवाही कर रहे हैं तो किस प्रकार से यह आंकड़ा तैयार किया जायेगा कि किस किसान का कितना क्षति हुआ? इस बारे में वाराणसी हरहुआ ब्लाक के कुछ गॉवों के किसानों से बातचीत किया गया तो लोगों ने बताया कि लेखपाल कौन है मैं नहीं जानता तथा वह गॉव में कभी आते भी नहीं है फिलहाल कुछ लोगों ने यह भी बताया कि लेखपाल आते तो हैं लेकिन गॉव के अपने कुछ चुनिन्दा लोगों के यहॉ आकर आंकड़े तैयार करते हैं और चले जाते हैं। हालांकी कुछ गॉव तो ऐसे भी हैं जहॉ के लोग लेखपाल को जानते तक नहीं हैं और न ही लेखपाल कभी उस गॉव में आते हैं। 


तो महोदय किसानों के आत्महत्या का दौर नहीं थम पायेगा।
किसानों ने जिस प्रकार से बताया कि लेखपाल केवल गॉव के चुनिन्दा लोगों के घर पर ही बैठकर आंकड़े तैयार कर रहे हैं  यदि यह सही है तो उसमें गॉव के कुछ किसान लाभ पाने से वंचित रह जायेंगे और वह मजबूरन आत्म हत्या कर लेंगे और यह दौर थमने का नाम नहीं लेगा। 

बाढ़ में भी हुआ था जमकर घपला। 
आपको याद होगा कि कुछ दिन पहले जब वाराणसी के वरूणा तटीय क्षेत्रों के किसानों को बाढ़ राहत आपदा के तहत लाभ दिया गया था उस दौरान कुछ ऐसे भी व्यक्ति ​थे जिनके नाम से खेत ही नहीं था उनका भी चेक आया था और कुछ लोगों का खेत नदी के किनार नहीं था उनका भी चेक कुछ लापरवाह अधिकारीयों के कारण आ गया था।
तो इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि बारिस द्वारा मचाई गयी तबाही के दौरान किसानों को लाभ पहुचाने के लिये सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास के सर्वे में घपलेबाजी न हो।  इसे दूर करने के उपाय को तलाशने की जरूरत है। 
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