Thursday, 23 April 2015

एक तरफ किसी की जान जाती रही और दूसरी तरफ पत्रकारों का कैमरा चलता रहा।

आम आदमी पार्टी की जंतर मंतर पर हो रही रैली में राजस्थान के किसान गजेन्द्र सिंह की मौत ने राजनेताओं व दिल्ली पुलिस के साथ साथ मीडिया की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। जब आप की रैली चल रही थी उस दौरान गजेन्द्र सिंह नीम के पेड़ पर चढे और चढ़ते दौरान वे मीडिया वालों से हाथ हिलाकर फोटों भी खिचवाये और इस दौरान फ़ोटो भी मीडिया कर्मियों ने बनाई है जो अखबारों और चैनलों पर दिखाया है। तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि गजेन्द्र सिंह मीडिया के नज़रों के सामने फाँसी पर लटक गए। जब गजेन्द्र सिंह पेड़ पर चढ़ने के बाद अपने गमछे से फंदा बनाये होंगे तो क्या मीडिया कर्मियों की निगाह उनके उपर नहीं गई होगी और यदि गई तो क्या चौथे स्तम्भ के लोग अपनी वाह वाही लूटने के लिए गजेन्द्र को मरते देख रहे थे और उनके मरने का इंतजार किये। और कुछ देर बाद जब गजेन्द्र सिंह की मौत हो जाती है तो ये खबर चलाने लगते हैं तथा आम आदमी पार्टी के नेताओं और दिल्ली पुलिस को सवालों के कटघरे में खड़े करके सवाल करना प्रारम्भ कर देते हैं।
यहाँ यह सवाल भी लाजमी है की क्या मीडिया के वे लोग दोषी नहीं हैं जो गजेन्द्र की फ़ोटो और विजुअल बनाते रहे और गजेन्द्र मर गए तो खबरों के कवरेज के लिए वाहवाही लूटने लगे?
क्या मीडिया के लोग उनको बचा नहीं सकते थे? 
यह सब लिखने के पीछे केवल यही कारण है की आज के समय में लोगों का विश्वास नेताओं और पुलिस वालों पर से उठ चूका है लेकिन चौथे स्तम्भ को आज भी लोग सही मानते हैं क्योंकि जब भी किसी जनसाधारण आदमी के समस्याओं का समाधान ये सफ़ेदपोस और खांकी वर्दी वाले नहीं करते हैं तो ये चौथा स्तम्भ ही विकल्प होता है। ये न्याय का आसरा मन में लेकर मीडिया के सामने अपने आँशु बहा लेते है और अपना दुःख दर्द बाँट लेते है। लेकिन जहाँ तक मेरा मानना है यदि चौथा स्तम्भ थोडा सा प्रयास किया होता तो गजेन्द्र सिंह की जान बच गई होती।
फ़िलहाल घटना के पीछे जो भी कारण हो वह तो जाँच होने के बाद ही आएगा लेकिन ये राजनेता टीवी पर दो चार दिन तक खुब तू चोर मैं सिपाही वाला खेल खेलते नजर आयेंगे। 
वाराणसी से प्रवीन यादव "यश" का ईस्वर से यही कामना है की उनके परिवार वालों को यह दुखद पल सहने की क्षमता प्रदान करें।
नोट:— यह लेख लिखने के पीछे किसी को आहत करना मेरी सोच नहीं है लेकिन क्या मानवता मर गयी थी दिल्ली में जंतर मंतर पर हो रही रैली के दौरान?
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