Thursday, 24 September 2015

सदियों पुरानी परंपरा को क्यों समाप्त करने पर तुले हैं माननीय? तो क्या ऐसे साफ रखेंगे माँ गंगा का जल?

प्रवीन यादव'यश', वाराणसी
9450112497

वाराणसी। जनपद के गोदौलिया चौराहे पर गणेश जी की प्रतिमा गंगा में विसर्जित करने के लिए धरनारत साधू संतों काशीवासियों पर  मंगलवार को मध्यरात्रि में जिस तरीके से अनवरत लाठियां बरसाईं गयी उसकी जीतनी निंदा की जाए कम है।
गंगा माँ को स्वच्छ करने का संकल्प लिया जाना बहुत अच्छी बात है लेकिन क्या हिन्दू धर्म के रीती रिवाजों को कटघरे में खड़ा करके माँ गंगा को स्वच्छ करना कहा का न्याय है।

आज भी गंगा में अनगिनत जगहों से गंगा के निर्मल जल में मलजल मिल रहे हैं साथ ही तमाम फैक्ट्रियों से निकलने वाला गंदा पानी भी गंगा और वरुणा के जल को दूषित कर रहा है। इसपर विचार किये बगैर गंगा में मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगाया जाना बहुत गलत है।

माननीय उच्च न्यायलय के आदेश का हवाला देते हुए अधिकारी माँ गंगा में मूर्ति विसर्जन को रोकने के लिए तैयार खड़े हैं लेकिन पूजा समितियों द्वारा भी यही रट लगाया जा रहा है कि मूर्तियों को गंगा में ही विसर्जित करेंगे ऐसे में प्रसाशन द्वारा तालाबों और कुंडों को मूर्ति विसर्जन के लिए विकल्प के रूप में देखा जा रहा है तथा तालाब और कुण्ड को मूर्ति विसर्जन के लिए तैयार किया जा रहा है ऐसे में प्राचीन तालाब और कुण्ड में यदि मूर्ति विसर्जित किया गया तो क्या तालाबों और कुंडो का अस्तित्व बच पायेगा? इसका उत्तर बहुत ही चौकाने वाला है।

अगले रास्ते के रूप में प्रसाशन द्वारा गंगा नदी के किनारे वैकल्पिक तालाब बनाया गया है और तर्क दिया गया है की इसी तालाब में मूर्तियां विसर्जित की जाएँगी तो यहाँ एक बात नहीं समझ में आती है कि गंगा का जलस्तर जब बढ़ेगा तो वह इस तालाब को अपने आगोस में ले लेगा और मूर्तियों सहित तालाब का जल गंगा में मिल जायेगा तब क्या होगा? यह भी एक बड़ा प्रश्न है।

हिन्दू धर्म में कई ऐसी परम्पराएँ,रीती-रिवाज और आस्थाएं हैं जो पूरी तरह माँ गंगा से सीधे जुडी हैं जैसे मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर शवदाह किया जाना भी सम्मिलित है। कल कोई यदि यह तर्क दे दिया कि इनके कारण भी गंगा का जल दूषित हो रहा है तो क्या यह सब भी बंद करा दिया जायेगा?

फ़िलहाल प्रसाशन द्वारा कोई अन्य विकल्प तैयार किया जाना चाहिए जैसे पूजा पंडालों में स्थापित की जाने वाली मूर्तियां पुआल और मिट्टी की जगह केवल मिट्टी से ही बनायीं जानी चाहिए और केमिकल का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए इसके बाद मूर्ति को माँ गंगा के जल में प्रवाहित करने के लिए लगाया गया रोक हटा देना चाहिए।

और अंत में प्रसाशन को यह भी ध्यान देना बहुत जरुरी है कि संत महात्माओं पर लाठी चलाने से पहले सौ बार सोच लेना चाहिए क्योंकि ऐसा किये जाने के बाद मानवीय भावनाएं तो आहत हुई ही हैं लोगों में एक प्रतिशोध की ज्वाला भी भड़क उठी है जो यदि सडकों पर आ गई तो काबू पाना शायद ही संभव होगा और काशी की गंगा-जमुनी तहजीब पर भी इसका बहुत ज्यादा असर होगा और फिर जलती हुई आग में घी डालने के लिए सोशल मीडिया भी बहुत बड़ा योगदान करेगा।

नोट:- लेख के माध्यम से किसी के भी भावनाओं को आहत पहुचाने का काम नहीं किया गया है फिर भी कहीं गलत है तो लेखक क्षमा प्रार्थी है।
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