Tuesday, 6 September 2016

राजनीति की नर्सरी या पुलिस के लिए सिरदर्द


शहर में आया छात्रसंघ चुनावो का मौसम

अरशद आलम
----------------------

वाराणसी। बरसों से छात्रसंघ की छवि राजनीति की नर्सरी की है। देशभर के छात्रसंघों ने तमाम कड़ियल नेताओं को जन्म दिया है। पुरनिए न सिर्फ इस धारणा में अब भी यकीन करते हैं बल्कि इसे और पुष्ट भी करना चाहते हैं। मगर मौजूदा हालात पर गौर करें तो नजारा अलहदा है। तिथियां घोषित न होने के बावजूद शहर में इन दिनों छात्रसंघ चुनावों की गर्माहट महसूस की जा सकती है। आये दिन विभिन्न संभावित उम्मीदवारों और उनके समर्थकों के बीच मारपीट और बवाल की खबरे आने लगी है। आरोप-प्रत्यारोप, मारपीट और मुकदमेबाजी की बहुतायत के चलते यह नर्सरी पुलिस के लिए नया सिरदर्द बनती जा रही है।

छात्र राजनीति की इस नर्सरी में कभी सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं की फसल लहलहाती थी। अब यहां भूमाफिया और अपराधियों, उद्योगपतियों, व्यापारियों, राजनैतिक दलों का बोलबाला है। तथाकथित रूप से अब भी छात्रों के हित की बात करने वाले छात्रनेता किसी न किसी पार्टी या रसूख वाले नेता का समर्थन रखते हैं। पिछले छात्रसंघ चुनावों में शामिल कई प्रत्याशियों का तो आपराधिक इतिहास भी रहा है। कालेज के यह छोटे चुनाव अब सम्मान की लड़ाई बन चुके हैं और लिंगदोह समिति की सिफारिशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

विभिन्न विश्वविद्यालय परिसर में गुण्डा गर्दी की घटनाये बढ़ गई है,  चुनावों में लाखों खर्च कर हजारों छात्रों के लिए लंगर का खाना चलता है। छात्रों को आई.डी. कार्ड समय पर नहीं मिलते जिससे चुनावों तक बाहरी लोग परिसर में घूमते रहते है। विश्वविद्यालय परिसर में छात्र आपस में भिडंते हैं, पुलिस पर पथराव करते है। प्रत्याशियों समेत कई छात्रों पर पुलिस केस दर्ज होते है।

धरना व जुलूस के द्वारा रास्ते रोके जाते है। छात्र गुट एक दूसरे के खिलाफ मुकदमें दर्ज कराते है, विश्वविद्यालय के बाहर निजी व सरकारी सम्पतियों पर खुले आम पोस्टर लगाये जाते है। बिना स्वीकृति वाहन रेलियां निकालकर ट्रैफिक बधित किया जाता है।

पूर्व में अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से ही छात्रसंघों के चुनाव होते थे। उनमें जातिवाद, धनबल व बाहुबल का कोई स्थान नहीं था। राजनैतिक पार्टियों का छात्रसंघ चुनावों में दखल नहीं था। प्राध्यापकों व छात्रों की भागीदारी से चुनाव कार्यक्रम सम्पन्न होते थे।

इस प्रणाली से शत प्रतिशत छात्र चुनावों में भाग लेते थे। पहले छात्र कक्षाओं से अपने प्रतिनिधि चुनते थे और ये निर्वाचित कक्षा प्रतिनिधि छात्रसंघ के पदाधिकारियों का चुनाव करते थे। एक सौहार्दपूर्ण एवं लोकतांत्रिक वातावरण बना रहता था।

छात्रसंघों के कार्यक्रमों का खर्चा प्राध्यापकों व छात्रों की, गठित कमेटी की देख रेख में होता था। राष्ट्रीय नेता, शिक्षाविद्, जाने माने इतिहासकार, वैज्ञानिक, समाज सेवी, विचारक, कलाकार, साहित्यकार, छात्रसंघों के कार्यक्रमों में आते थे। शिक्षणेतर गतिविधियां एवं कार्यक्रम यथा सेमीनार, गोष्ठियां, व्याख्यानमाला, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कवि सम्मेलन, मुशायरा, वाद-विवाद प्रतियोगिताएं कलैण्डर के अनुसार चलती थी। छात्रसंघ की गतिविधियां शैक्षणिक कार्यक्रम का भाग होती थी और शिक्षाकोत्तर गतिविधियां मानी जाती थी।

छात्रसंघ द्वारा आयोजित गतिविधियां बौद्धिक, शारीरिक, मानसिक विकास व विस्तार के लिए होती थी। छात्रों को राजनीति करना सिखाना उद्देश्य नहीं होता था। उस समय सरस्वती के इन मंदिरों में, पुलिस को प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। पुलिस प्रवेश को प्रिंसिपल व प्राध्यापक अपमान समझते थे। छात्रों पर उनका अनुशासन था, शांति व्यवस्था बनाये रखना अपना उत्तर दायित्व समझते थे, निभाते थे।

आज का छात्रसंघ चुनाव जातिवाद, धनबल, भुजबल, के आधार पर लड़ा जाता है। राजनैतिक दल खुलकर इन चुनावों में भाग लेते हैं। कई स्थानों पर तो चुनावी हिंसा होने लगी है। बुद्घिजीवी वर्ग, पढऩे लिखने वाले विद्यार्थी वर्तमान स्थिति व चुनाव तरीके के आलोचक हैं। अब राजनैतिक दलों के टिकटों पर चुनाव में भाग लेने वाले युवकों के कारण छात्र संघों  में पूर्णतया राजनीति घर कर गई है।

पढऩे लिखने वाले छात्रों की बड़ी संख्या चुनाव प्रचार व मतदान से दूर होते जा रहे हैं। उनके मत का कोई मूल्य नहीं रहा है। मतदान बाहरी प्रभाव से होते हैं। नीति, कार्यक्रम, योग्यता का कोई अर्थ नहीं रह गया। अब छात्रसंघ के चुनावों में केवल समाज में भय, आतंक, गैर वाजिब वसूलियां व कानून व्यवस्था की स्थिति पैदा हो रही है। राजनैतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों का चयन जातिवाद के आधार पर होने लगा है।

चुनाव जीतने के लिए नये नये तरीकों, नियोजित योजनाओं, से मतदाताओं को खरीदने, दवाब डालने, नियमों की खुली अवहेलना करने, लंगर लगाने, विधान सभा व लोकसभा के चुनावों से भी अधिक खर्चीले प्रचार के बीच स्वतंत्र एवं निष्पक्ष  चुनाव पर प्रश्न चिन्ह लग गया है।

कुछ वर्षों  से ग्रामीण क्षेत्रों में भी सामाजिक शांति में विघ्न होने लग गया है, कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने लगी है। विश्वविद्यालयों में जातिवाद व सामाजिक गुटबाजी फैलती जा रही है। आज विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ जाने से इन संस्थाओं को व्यापार व राजनीति का केन्द्र बना दिया है।

अब हालात यह है की, शांति बनाये रखने के लिए चौबीसों घंटे पुलिस बल विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में तैनात करना पड़ता है। प्रतिभावान छात्र असहाय अनुभव करते हैं और चुनावों में हिस्सा लेना पसन्द नहीं करते वे चुनावों से दूर ही रहना पसन्द करते हैं।

इन हालातों में विश्वविद्यालयो में शैक्षणिक वातावरण समाप्त हो रहा है। आज के छात्रसंघ के पदाधिकारियों को पढ़ाई लिखाई से भी कोई वास्ता नहीं रहता। वे अपने को भविष्य का नेता साबित करने में समय व्यतीत करते हैं। कुल मिला के यह खेल खतरनाक रूप ले रहा है और भविष्य में सत्ता की प्रथम सीढ़ी की इस पायदान की लड़ाई ने पुलिस प्रशासन का सरदर्द तो बढ़ा ही दिया है।
साभार

Post a Comment